गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत आता है व इसके आसपास के क्षेत्र को ब्रज भूमि भी कहा जाता है।
यह भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को भक्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं।
सदियों से यहां दूर-दूर से भक्तजन गिरिराज जी की परिक्रमा करने आते रहे हैं। यह 7 कोस की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल गोविन्द कुंड, पूंछरी का लोठा, जतीपुरा, राधाकुंड कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, दानघाटी और मुखारविंद इत्यादि हैं।
गोवर्धन का इतिहास
❤ गर्गसंहिता के अनुसार पुराने समय में तीर्थ यात्रा करते हुए पुलस्त्यजी ऋषि गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे तो इसकी सुंदरता देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गए और द्रोणाचल पर्वत से निवेदन किया कि मैं काशी में रहता हूं। आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए, मैं उसे काशी में स्थापित कर वहीं रहकर इसकी पूजा करूंगा।
❤ द्रोणाचल पर्वत अपने पुत्र गोवर्धन के लिए दुखी हो रहे थे, लेकिन गोवर्धन पर्वत ने ऋषि से कहा कि मैं आपके साथ चलुंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। पुलस्त्यजी ने गोवर्धन की यह बात मान ली। गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं। आप मुझे काशी कैसे ले जाएंगे?
❤ पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल से तुम्हें अपनी हथेली पर उठाकर ले जाऊंगा। तब गोवर्धन पर्वत ऋषि के साथ चलने के लिए सहमत हो गए। रास्ते में ब्रज भूमि आई। उसे देखकर गोवर्धन सोचने लगा कि भगवान श्रीकृष्ण यहां बाल्यकाल और किशोरकाल की बहुत सी लीलाएं करेंगे। अगर मैं यहीं रह जाऊं तो उनकी लीलाओं को देख सकूंगा। ये सोचकर गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य ऋषि के हाथों में और अधिक भारी हो गया।
❤ ऋषि को विश्राम करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद ऋषि ने गोवर्धन पर्वत को ब्रज में रखकर विश्राम करने लगे। ऋषि ये बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं रखना नहीं है। कुछ देर बाद ऋषि पर्वत को वापस उठाने लगे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि ऋषिवर अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता। मैंने आपसे पहले ही आग्रह किया था कि आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। तब पुलस्त्यजी उसे ले जाने की हठ करने लगे, लेकिन गोवर्धन वहां से नहीं हिला। तब ऋषि ने उसे श्राप दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया, अत: आज से प्रतिदिन तिल-तिल कर तुम्हारा क्षरण होता जाएगा। फिर एक दिन तुम धरती में समाहित हो जाओगे। तभी से गोवर्धन पर्वत तिल-तिल करके धरती में समा रहा है। कलियुग के अंत तक यह धरती में पूरा समा जाएगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पर्वत को इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए अपनी सबसे छोटी उंगली पर तीन दिनों तक उठा कर रखा था और सभी वृंदावन वासियों की रक्षा इंद्र के कोप से की थी।
गिर्राज जी द्वापर युग के है इसके प्रमाण आज भी गिर्राज अर्थात गोवर्धन पर्वत पर मिलते है|
जिनमे देवराज इंद्र का मान मर्दन के देवराज इंद्र का गोवर्धन पर्वत पर आना, एरावत हाथी के पैर के चिन्ह, सुरभि गाय की दूध की धार के चिन्ह, सिन्दूरी शिला, बारिश के निशान, बलराम और कृष्ण के पैरो के निशान, राधा कृष्ण के रास के प्रमाण, सोलह श्रृंगार इत्यादि अनेक प्रमाण मिलते है|

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